जवाबदेही तय करने के साथ ख़ुद की कार्यशैली भी बने मिसाल, पढ़िए क्यों एक फ़ैसले के साथ डीएम निकिता खंडेलवाल पर भी उठे सवाल…
एक्शन का रिएक्शन भी हो सकता है आये दिन उत्तराखंड में कुछ अधिकारियों के एक्शन उन्हें भी सवालों के कठघरे में लाकर खड़ा कर देते है क्योंकि उनके सवाल किसी अधीनस्थ को लापहरवाही के घेरे में खड़ा करते है। तो ख़ुद उनका भी अतीत सवाल जवाब का धुआं उठाने लगता है ऐसे में अधिकारियों की खुद की कार्यशैली और जवाबदेही पर भी प्रश्नचिन्ह लगने लगता है…. मामला टिहरी गढ़वाल डीएम निकिता सिंह से जुड़ा है उन्होंने प्रशासनिक कार्यशैली में शिथिलता दिखाने वाले चार अधिकारियों के नवंबर माह के वेतन आहरण पर रोक लगाने का उनका कड़ा निर्णय लिया, डीएम के इस फैसले को ‘लचीला’ मीडिया, प्रशासन को दिया गया एक स्पष्ट संदेश बता रहा है जिसके तहत जनहित के मुद्दों पर लापरवाही और कार्रवाई में देरी किसी भी स्थिति में बर्दाश्त नहीं।
सूत्रों के अनुसार, यह कार्रवाई जनता मिलन कार्यक्रम के दौरान समाचार पत्रों में प्रकाशित नकारात्मक खबरों की समीक्षा के बाद की गई। डीएम ने स्पष्ट निर्देश दिए थे कि संबंधित अधिकारी समयबद्ध रूप से ATR यानी Action Taken Report उपलब्ध कराएं। परंतु निर्धारित सीमा बीत जाने के बाद भी रिपोर्ट प्रस्तुत न होने पर यह कठोर कदम उठाया गया।
थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं
जब खुद नितिका खंडेलवाल ITDA सूचना प्रौद्योगिकी विकास एजेंसी, देहरादून में निदेशक के पद पर थीं, तब आईटी विभाग एक बड़ी चुनौती से गुजरा। बीते वर्ष अक्टूबर में उत्तराखंड सरकार के डेटा सेंटर पर गंभीर साइबर अटैक हुआ, जिसने पूरे सरकारी सिस्टम को लगभग तीन महीनों तक ठप्प कर दिया। डेटा रिकवरी में 27 दिन लगे, 22 से अधिक सरकारी वेबसाइटें बंद करनी पड़ीं, सुरक्षा ऑडिट और सिस्टम रीकॉन्फ़िगर करने में महीनों का समय लगा, और सत्ता गलियारों की चर्चाओं को मानें तो लगभग 300 करोड़ रुपये खर्च करने के बाद ढांचा किसी तरह बहाल किया गया वह भी अब तक पूर्णतः दुरुस्त नहीं हो पाया है।
अचरज यह है कि इतने बड़े आईटी संकट जिसे मामूली चूक नहीं कहा जा सकता, उसके बाद भी सुश्री नितिका को डीएम टिहरी का पदभार दिया गया। नौकरशाही की भाषा में जिसे पदोन्नति माना जाता है।
यहीं सवाल उठता है
जब जवाबदेही की बात आती है, तो कार्रवाई नीचे के अधिकारियों पर होती है। पर जब शीर्ष स्तर पर बड़े पैमाने की त्रुटियाँ पूरे सिस्टम को पंगु बना दें, तो वही लोग पुरस्कृत क्यों होते हैं? यह कैसा न्याय और यह कैसी दोहरी नीति?
डिजिटल इंडिया की जमीन पर हकीकत
राज्यभर में डिजिटल उत्तराखंड का जोरदार प्रचार किया गया। दावा है कि सब कुछ या कहें कि बहुत कुछ ऑनलाइन, पारदर्शी और सहज हो गया है। पर असल में गांवों में नेटवर्क का नामोनिशान नहीं। राशन कार्ड की eKYC तक पूरी करने के लिए तैयार ऐप अंततः अंतिम चरण में जाकर फेल हो जाता है। आम आदमी घंटों लाइन में लगे, कैफे और दुकानों पर चक्कर काटे पर फिर भी प्रक्रिया पूरी नहीं। अंतिम तारीख 30 नवंबर, और सिस्टम लगातार फेल।
लोग पूछने लगे हैं क्या यह तकनीकी विफलता है या गरीबों से वसूली का नया तंत्र? अगर प्रक्रियाएं सचमुच ऑनलाइन और सुगम हो जाएं, तो फिर दलाल और भ्रष्ट अधिकारी गरीबों को लूटेंगे कैसे?
लेकिन प्रचार का शोर जारी है कि बस तर्जनी उठाइए, और हर काम चुटकी में हो जाएगा।

