भाजपा उत्तराखंड में हलचल, अपने ही मुसीबत खड़ी करने में जुटे…
उत्तराखंड की सियासत इन दिनों बड़े दिलचस्प मोड़ पर खड़ी है.. एक ओर पुष्कर सिंह धामी चुनावी रणभूमि में विकास.. निवेश.. युवा और सख्त प्रशासन का बिगुल बजा रहे हैं यानि मानो पूरी ताकत से नैया किनारे लगाने की तैयारी हो.. दूसरी ओर उसी नैया में बैठे कुछ जनप्रतिनिधि कभी चप्पू उल्टी दिशा में चला देते हैं तो कभी बीच धारा में छेद करने की कोशिश करते दिखते हैं..
बीजेपी के पूर्व विधायक प्रणव सिंह चैंपियन का हालिया कार्यक्रम वाला वीडियो राजनीति से ज्यादा रंगमंच का दृश्य लग रहा था.तवायफ पर उड़ते नोटों ने विपक्ष को बैठे-बिठाए नैतिकता का व्याख्यान देने का अवसर दे दिया.. जनता यह समझने लगी है कि “संस्कार” और “संस्कृति” भाषणों में जितनी गंभीर लगती है. व्यवहार में उतनी ही हल्की क्यों हो जाती है.. सवाल यह नहीं कि कौन क्या करता है. सवाल यह है कि कैमरे के दौर में कौन क्या करते पकड़ा जाता है..
उधर रायपुर विधायक उमेश शर्मा काऊ से जुड़ा शिक्षा निदेशक प्रकरण यह याद दिलाता है कि सत्ता में संयम सबसे महंगी लेकिन सबसे जरूरी पूंजी होती है. सरकारी दफ्तर अगर जनप्रतिनिधियों की शक्ति प्रदर्शन की जगह बनेंगे. तो “सुशासन” शब्द खुद ही फाइलों में छिपने लगेगा.. विपक्ष को आरोप लगाने की मेहनत भी कम करनी पड़ती है.जब दृश्य खुद बोलने लगते हैं..
और फिर आते हैं बाजपुर विधायक अरविंद पांडेय जिनके “लेटर बम” समय-समय पर यह अहसास कराते रहते हैं कि सरकार के भीतर भी सरकार से असंतोष की हल्की-हल्की सरगोशियां हैं.. लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है.पर जब वह प्रेस नोट के रास्ते बाहर आए तो संदेश यह जाता है कि घर की दीवारें थोड़ी पतली हो चली हैं..
राजनीति में विरोधी कम नुकसान पहुंचाते हैं.. आत्मघाती प्रवृत्तियां वाले अपने ज्यादा.. चुनाव नजदीक हैं. मतदाता अब सिर्फ घोषणाएं नहीं आचरण भी तौल रहा है.. अगर शीर्ष नेतृत्व सख्त छवि गढ़ने में जुटा है तो नीचे के स्तर पर ढीले दृश्य पूरी कहानी बिगाड़ सकते हैं.. वरना इतिहास यही लिखेगा विपक्ष से ज्यादा सरकार को अपनी ही हरकतों ने चुनौती दी…

