बुजुर्ग दंपति के जीवन की आस बने हरिद्वार एसडीएम जितेंद्र कुमार, कानूनी राह से सुनिश्चित किये अधिकार, आमजन में हो रही चर्चा…
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हरिद्वार: कानून प्रेरणा भी है और अधिकारों का रक्षक भी… धर्म नगरी हरिद्वार में एक अधिकारी ने जिम्मेदारी और संवेदनशीलता की अनोखी मिसाल पेश की… आज भी ऐसे अधिकारी जो समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व के बोध को अपने अंतःकरण में महसूस करते है औऱ धरातल पर हर निर्बल को सबल बनाने के लिए संकल्पित है हरिद्वार में एसडीएम जितेंद्र सिंह ने जब बुजुर्ग दंपति मामले तत्काल सख्त एक्शन लेते हुए न्याय की राह सुनिश्चित की… पढ़िए पूरा मामला…
हरिद्वार प्रशासन ने एक ऐसा फैसला सुनाया है जिसने पूरे जिले ही नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा छेड़ दी है। उपजिलाधिकारी (SDM) जितेन्द्र कुमार द्वारा सुनाया गया यह निर्णय न केवल कानूनी रूप से मजबूत है बल्कि मानवीय संवेदना से भी भरपूर है। इस फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि प्रशासन अब बुजुर्गों के सम्मान और अधिकारों की रक्षा के लिए भी उतनी ही तत्परता से काम करेगा जितना किसी बड़े आपराधिक मामले में करता है।
हरिद्वार में वृद्ध माता-पिता ने अपने ही बच्चों के खिलाफ गुहार लगाई थी। वे बच्चे, जो कभी मां-बाप के प्यार और परिश्रम की बदौलत बड़े हुए, आज उन्हीं को घर से निकालने और संपत्ति पर कब्जा जमाने की कोशिश में लगे थे जब मामला प्रशासन के संज्ञान में आया तो SDM जितेन्द्र कुमार ने तुरंत हस्तक्षेप किया। उन्होंने न केवल वृद्ध दंपति की सुरक्षा सुनिश्चित की बल्कि उन नालायक बच्चों को यह सख्त संदेश भी दिया कि कानून अब माता-पिता के पक्ष में मजबूती से खड़ा है।यह आदेश “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम, 2007” के तहत सुनाया गया — एक ऐसा कानून जो अब तक कागज़ों तक ही सीमित था, लेकिन SDM जितेन्द्र कुमार ने उसे ज़मीन पर उतारकर समाज को झकझोर दिया।
स्थानीय बुजुर्ग समाजसेवियों ने इस निर्णय को सामाजिक चेतना का प्रतीक बताया है। उनका कहना है कि यह फैसला आने वाली पीढ़ियों को यह सोचने पर मजबूर करेगा कि मां-बाप केवल संपत्ति का साधन नहीं, बल्कि जीवन के सबसे पवित्र स्तंभ हैं।
सामाजिक कार्यकर्ता गुरमीत सिंह ने कहा, “SDM साहब ने जो किया है, वह एक मिसाल है। आज जब समाज में रिश्तों की कद्र घट रही है, तब ऐसे प्रशासनिक फैसले एक नई उम्मीद देते हैं।” एक अन्य समाजसेवी फरजाना बेगम ने कहा, “यह फैसला उन सभी बुजुर्गों के लिए प्रेरणा है जो अपनों के बीच अकेलापन महसूस करते हैं। अब उन्हें भरोसा रहेगा कि प्रशासन उनके साथ है।”
हरिद्वार जैसे धार्मिक शहर में यह फैसला आस्था और न्याय दोनों के संगम का उदाहरण बन गया है। यहां प्रशासन ने न केवल कानून के अनुसार कार्रवाई की बल्कि बुजुर्गों की भावनाओं को भी समझा।
फैसले के बाद SDM जितेन्द्र कुमार ने कहा, “हमारा मकसद -बाप की सेवा सबसे बड़ा धर्म है। जो संतान इसका पालन नहीं करती, वह कानून के साथ-साथ समाज की नजर में भी अपराधी है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि जिले में ऐसे मामलों पर लगातार निगरानी रखी जाएगी और किसी भी वृद्ध व्यक्ति के साथ अन्याय होने पर तुरंत कार्रवाई की जाएगी।
फैसले की खबर जैसे ही शहर में फैली, सोशल मीडिया से लेकर मंदिर गलियों तक इस पर चर्चा शुरू हो गई। लोगों ने कहा कि यह फैसला “बेटों-बेटियों को आईना दिखाने वाला कदम” है।कई परिवारों ने इसे घर-घर में शिक्षा देने वाला निर्णय बताया।एक स्थानीय महिला ने कहा, “अगर हर जगह ऐसे SDM हों तो कोई मां-बाप अपने ही बच्चों से तंग नहीं होंगे।”कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह आदेश प्रशासनिक सख्ती के साथ मानवीय करुणा का उत्कृष्ट उदाहरण है। इससे समाज में यह संदेश गया है कि कानून अब केवल अपराधियों के लिए नहीं, बल्कि उन माता-पिता के लिए भी है जिनकी आंखों में अपनों के लिए अब भी उम्मीद बाकी है।
अब लौटे मां-बाप के चरणों में वे बच्चे
सबसे भावुक दृश्य तब देखने को मिला जब आदेश के बाद वे ही बच्चे, जिन्होंने मां-बाप को घर से निकाल दिया था, उनके पास लौटकर माफी मांगते नजर आए।
बुजुर्ग दंपति की आंखों में आंसू थे, पर उनमें गुस्सा नहीं, संतोष और राहत झलक रही थी। उन्होंने कहा — “हमें अब विश्वास है कि सरकार और प्रशासन हमारे साथ हैं। जो हमने खोया था, वह आज हमें लौट आया है — सम्मान।”
हरिद्वार का यह फैसला आने वाले समय में राष्ट्रीय उदाहरण के रूप में देखा जाएगा।यह केवल एक बुजुर्ग दंपति की जीत नहीं, बल्कि हर मां-बाप के आत्मसम्मान की जीत है। SDM जितेन्द्र कुमार का यह फैसला न केवल हरिद्वार की प्रशासनिक क्षमता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि जब कानून और संवेदना साथ खड़े हों तो समाज में बदलाव अवश्य आता है।

