इंडिया में गठबंधन में असंतुलन, राहुल की लोकप्रियता, छिटपुट गठबंधन का असर निकाय चुनाव में भी, पढ़िए पत्रकार डॉ. रमेश खन्ना का लेख…

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 किसी भी दल की नहीं अपितु भारतीय राजनीति पर निष्पक्ष चर्चा की जाये तो निष्कर्ष निकलता कि राजनीति नहीं बल्कि देश ही दल-दल में फंसा हुआ है। सबसे पहले विपक्ष की बात करें। इंडिया गठबंधन बना था तो उम्मीद जगी थी कि अब राजनीतिक संतुलन स्थापित हो सकेगा और स्थापित हुआ भी। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को अल्पमत में आने का ज़ोरदार धक्का लगा। देश में पंगु सरकार बन सकी। बिल पास कराने में सरकार को बार-बार नाकामी का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन राहुल गांधी की लोकप्रियता बढ़ती देख इंडिया गठबंधन के घटक दलों में बैचेनी बढ़ने लगी। अलग-अलग क्षत्रपों के नेताओं की बयानबाजी और दिल्ली के विधानसभा चुनावों से लग रहा है कि इंडिया गठबंधन समाप्त पर है।

देश-प्रदेशों की राजनीति का असर स्थानीय राजनीति पर पड़ना स्वाभाविक है। हरिद्वार में निकाय चुनावों में चल रही दलगत राजनीति के आपके आंकलन से मैं सहमत हूॅं।

नितीश एवं नायडू जी का एजेंडा बिल्कुल साफ है मोदी जी प्रधानमंत्री आप लेकिन सरकार की लगाम हमारे हाथ में रहेगी। लगता है आजकल मोदी जी के चेहरे पर मायूसी एवं भाषणों में निराशा इसी कारण से स्पष्ट रूप से छलक रही है।

मोदी सरकार की कमज़ोर हालत का असर विदेशी संबंधों में भी दिखाई दे रहा है। चीन लगातार भारतीय सीमा को कुतर रहा है। अमेरिका के आगामी राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने इरादे बिल्कुल साफ कर दिए हैं। स्पष्ट कर दिया गया है अगर अमेरिका से रियायतें चाहिएं तो उसका सही मायने में सहयोगी भी बन कर दिखाना होगा। कुल मिलाकर सभी पड़ोसी देशों के साथ हमारे संबंध ठंडे बस्ते में पड़े हुए हैं। पाकिस्तान और चीन के अतिरिक्त अब बंगलादेश भी भारत के साथ शत्रु जैसा व्यवहार करने लगा है। भूटान, श्रीलंका, मालद्वीव, नेपाल सभी अब खुल कर चीन के पाले में हैं। तत्काल रूप से श्रीमान जय शंकर जी को विदेश मंत्री पद 

तत्काल रूप से श्रीमान जय शंकर जी को विदेश मंत्री पद से विदा कर देना चाहिए। लेकिन सबसे बड़ी दिक्कत है मोदी जी को काबिलियत नहीं यसमैन चाहिएं। वर्ष 1970 में पूर्वी पाकिस्तान अब बंगला देश के लिए संघर्षरत स्व॰ प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में देश का पक्ष रखने के लिए स्व॰ अटल बिहारी जी की सेवा ली थी। कूटनीति इसे कहते हैं।

कुल मिलाकर भारतीय राजनीति संक्रमण काल से गुजर रही है। पक्ष एवं दोनों अपेक्षाकृत कमज़ोर हैं। मध्यावधि चुनाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

                              डॉ० रमेश खन्ना

                                वरिष्ठ पत्रकार

                           हरिद्वार (उत्तराखंड)

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