February 1, 2026

भाजपा के लिए पंजाबी बिरादरी क्या सिर्फ एक वोट बैंक? पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार डॉ. रमेश खन्ना का लेख….

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विभाजन का दंश झेलने  के बाद आजादी के बाद से अब तक पंजाबी बिरादरी ने शुरू से ही भाजपा का दमन थमा हुआ है। पर, मौजूदा परिदृश्य में भाजपा के लिए पंजाबी बिरादरी महज वोट बैंक से ज्यादा कोई अहमियत नहीं रखती है। हरिद्वार में इसकी तस्वीर शीशे की तरह साफ हो जाती है, इसकी मुख्य वजह पंजाबी बिरादरी में बिखराव होना है, जिसके चलते भाजपा अपनी मनमानी पर उतारू है। नगर निगम चुनाव पर फोकस करें तो पंजाबी बिरादरी का वोट बैंक सबसे अधिक है, पर पार्षदों के टिकट के नाम पर भाजपा ने पंजाबी बिरादरी को सिरे से नकार कर रख दिया। यही नहीं मेयर पद पर भी पंजाबी बिरादरी का दावा सबसे मजबूत था लेकिन पंजाबी बिरादरी को पीछे धकेलना के लिए बुने जाल के तहत अंत में मेयर  सीट रिजर्व कर दी गई। इसके बावजूद भी पंजाबी बिरादरी की आंखें खुलने का नाम नहीं ले रही है।

 “राज्य गठन के बाद ब्राह्मण चेहरे को नगर सीट से विधानसभा भेजा गया। इसके बाद से लेकर अब तक सीट पर मदन कौशिक काबिज है ।वर्ष 2003 में हुए नगर पालिका के चुनाव में पंजाबी बिरादरी के मदन मोहन सहगल को भाजपा ने चुनाव मैदान में उतारा जरूर था,पर उनकी हार हुई ।उनकी हार क्यों हुई? यह हर कोई भली-भांति जानता है ।फिर भी पंजाबी बिरादरी ने सबक लेना ठीक नहीं समझा। यह बिरादरी की  पराजय थी।

” वर्ष 2008 में फिर पंजाबी बिरादरी का दावा मजबूत था लेकिन अंत में सीट रिजर्व कर दी गई।  कमल जोड़ा भाजपा के बैनर तले मैदान में उतरे। चुनाव भी जीते लेकिन उसकी  असल वजह  उनका ओबीसी होना था। तब ब्रह्मलीन संत हंसदास ने उन्हें टिकट दिलवाया था और बिरादरी को एकजुट कर विजय पताका फहराई थी।

” बात यहीं खत्म नहीं होती वर्ष 2013 में  नगर निगम घोषित हुआ।  फिर वैश्य समाज के मनोज गर्ग को भाजपा ने अपना चेहरा बनाया। उनको पंजाबी बिरादरी ने सिर माथे पर बिठाकर मेयर बनाने में शिद्दत से कार्य किया। 

” वर्ष 2018 में पंजाबी बिरादरी की किस्मत जरूर खुली लेकिन अनु कक्कड़ को पराजय का मुंह देखना पड़ा। इसकी वजह भी एक नेता बना। जिसकी आंख में पंजाबी बिरादरी खटकती है।उसी ने मक्कड़ जाल बुना।  भीतर घात कर अनु कक्कड़ को चुनाव मैदान में परास्त कराया।क्योंकि अनु बेहद अच्छी सूझबूझ रखती है और आगे चलकर हरिद्वार सीट से विधानसभा की दावेदार भी हो सकती थी।

” मौजूदा समय में भाजपा जिला अध्यक्ष की कुर्सी वैश्य समाज के कब्जे में है। ऐसे में इस दफा पंजाबी समाज को उम्मीद थी कि मेयर उनका होगा।  पर अंत में फिर खेल हुआ ।हरिद्वार की राजनीति पर पकड़ रखने वाले ब्राह्मण चेहरे ने फिर पंजाबी बिरादरी को पीछे धकेलते हुए सीट  रिजर्व करने में मुख्य भूमिका अदा की ।यही नहीं मेयर से तो पंजाबी बिरादरी वंचित हो ही गई ।पर पार्षदों के टिकट वितरण में भी पंजाबी बिरादरी को जलील किया गया। महज कृष्णा नगर वार्ड पर सिख परविंदर गिल चुनाव मैदान में है लेकिन उसके अलावा किसी भी वार्ड में पंजाबी प्रत्याशी दूर-दूर तक नहीं दिखाई देता ।रामनगर वार्ड में भी महा ब्राह्मण को भाजपा ने प्रत्याशी बनाया है। ऐसे में पंजाबी बिरादरी के सामने रीत रिवाज का धर्म संकट आ खड़ा हुआ है। यहां तक सिंधी बिरादरी को पार्षद का टिकट मिला है।

“सबसे अधिक ब्राह्मण चेहरे को पार्षदों का टिकट दिया गया है। दूसरे नंबर पर वैश्य बिरादरी है। इसके अलावा अन्य सभी बिरादरियों को टिकट बांटे गए हैं ,जिनका वोट बैंक शून्य के बराबर है। उन बिरादरियों को भी भाजपा ने मौका दिया है ।पर सबसे अधिक मतदाताओं वाली पंजाबी बिरादरी नदारद है।

पंजाबी बिरादरी को अब सोचना होगा कि भाजपा उनका इस्तेमाल कर रही है या  असल में उनकी हितेषी है। इस चुनाव में ही एकजुटता का प्रदर्शन किया जा सकता है। बिरादरी को अपनी बिरादरी के प्रत्याशियों के साथ हर हाल में खड़े होकर ताकत का एहसास करना चाहिए। यही नहीं बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व की भी आंखें खुलना जरूरी है, जिनके लिए पंजाबी बिरादरी महज इस्तेमाल होने वाली बिरादरी बनकर रह गई है।

                               डॉ० रमेश खन्ना 

                               वरिष्ठ पत्रकार

                            हरिद्वार (उत्तराखंड)

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