कन्या पूजन धर्म संस्कृति का आधार, महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद बन रहे लाखों लोगों की प्रेरणा, बांसवाड़ा में होगा भव्य आयोजन…
श्रद्धा पूर्वक धर्म संस्कृति का पालन और संवर्धन, स्वामी अवधेशानंद महाराज ने त्याग और तप के माध्यम से मानव जाति के कल्याण के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया बांसवाड़ा तपोवन में उनके द्वारा किये जा रहे कार्य किसी बड़े धार्मिक अनुष्ठान से कम नहीं जिनसे आज लाखों लोग धर्मपरायणता की शिक्षा ले रहे हैं…
कन्या पूजन, धर्म शक्ति और श्रद्धा का संवर्धन करने वाले सनातन संस्कृति के अदभुत स्थल गीता कुटीर तपोवन, बांसवाड़ा में तीन दिवसीय दिव्य धार्मिक आयोजन का प्रारंभ हुआ। प्रथम दिवस की शुरुआत मां मंदाकिनी पूजन से हुई, जिसे वैदिक मंत्रोच्चार के साथ, सैकड़ों संतों की साक्षी में विद्वान ब्राह्मणों द्वारा विधिपूर्वक सम्पन्न किया गया। तत्पश्चात मां सिद्धेश्वरी मंदिर में पूजन एवं ध्वजारोहण किया गया, जिसमें शक्ति भोग आटा के संचालक केवल कृष्ण कुमार, कथा व्यास पंडित विमल कुमार, राजेश शर्मा, व सैकड़ों भक्तगण उपस्थित रहे।
धार्मिक परंपरा का निर्वाह करते हुए, कार्यक्रम के पश्चात बाबा केदारनाथ धाम की यात्रा पर जा रहे संतों को छाता, चप्पल और दक्षिणा भेंट कर सम्मानपूर्वक विदाई दी गई। भंडारे के माध्यम से सेवा और सम्मान की यह परंपरा 20 वर्षों से अविराम चल रही है, जिसका शुभारंभ स्वयं सतगुरुदेव स्वामी गीतानंद महाराज ने किया था।
इस कार्यक्रम का विशेष आयोजन 12 जून को होने वाला भव्य कन्या पूजन, जिसके लिए बांसवाड़ा, बस्ती, बसु, केदार सहित दूरदराज के गांवों में कन्याओं को आमंत्रित किया जा रहा है। स्वयं धर्म प्रचारक दल गांव-गांव जाकर कन्या आमंत्रण कर रहा है, ताकि अधिक से अधिक बालिकाओं को देवी स्वरूप मानकर सम्मानित किया जा सके।
इस अवसर पर महामंडलेश्वर स्वामी अवशेषानंद महाराज ने भावपूर्ण शब्दों में कहा:
“आज इस देश को कन्या की जितनी आवश्यकता है, उतनी किसी और की नहीं। कन्या ही सृष्टि का आधार है। जहां कन्या नहीं, वहां संस्कृति नहीं। भारत सरकार ‘बेटी बचाओ’ का अभियान चला रही है और हम उसका समर्थन करते हुए धर्म की इस परंपरा को जीवित रख रहे हैं।”
उन्होंने बांसवाड़ा जैसे दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में हजारों कन्याओं की सहभागिता को भोलेनाथ की कृपा बताया और कहा कि जहां अन्यत्र नवरात्रों में नौ कन्याएं जुटाना कठिन होता है, वहीं यहां हजारों कन्याएं सहज आ जाती हैं, यह चमत्कार नहीं, सद्गुरुदेव की कृपा और सनातन संस्कृति की जीवंतता है।
यह तीन दिवसीय आयोजन अब केवल एक धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि जनमानस को जोड़ने, कन्या सम्मान बढ़ाने और सनातन परंपरा को जीवंत रखने का सशक्त माध्यम बन गया है। स्वामी गीता नंद जी द्वारा प्रारंभ की गई यह साधना आज बड़े स्तर पर आमजनमानस की चेतना को प्रखर कर रही है।






