शीर्ष नेतृत्व का सिरमौर, उत्तराखंड का दुलारा, सीएम धामी की कार्यशैली राजनीति में धाकड़ से बनी धुरंधर….

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काम और नाम हर जगह बोलता है चाहें वो पार्टी नेतृत्व हो या पूरा प्रदेश, भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से लेकर उत्तराखंड की जनता तक सीएम पुष्कर सिंह धामी की कर्मशक्ति का अटूट सेवाभाव और आत्मीय व्यवहार का जलवा ऐसे बिखर चुका है जैसे लगातार चमकने वाले ध्रुव तारे की हमेशा चमकने वाली चमक….

देशभर में पीएम मोदी, गृह मंत्री अमित शाह अपने सटीक निर्णयों के लिए जाने जाते है उत्तराखंड का सीएम दोबारा पुष्कर सिंह धामी को बनाकर उन्हें अपनी सटीक निर्णय क्षमता का परिचय दिया तो नेतृत्व के विश्वास को मजबूत करने में सीएम धामी ने भी कोई कोर कसर नहीं छोड़ी.. सीएम धामी के फैसलों के दम और उनकी बातों के मर्म की भाजपा संगठन को भी भली भांति पहचान है यूसीसी, भू कानून, नकल विरोधी कानून सहित कई ऐतिहासिक फैसलों को लागू करने वाले सीएम धामी का असर पहाड़ से लेकर दिल्ली तक दिखा…

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने आज अपने कार्यकाल के चार वर्ष पूरे कर लिये हैं। इससे पहले की सरकार में उनका कार्यकाल महज 8 महीने का रहा। इन दोनों कालखण्ड में धामी बतौर मुख्यमंत्री अपनी अलग पहचान स्थापित करने में सफल रहे। चार साल में प्रदेश को तमाम महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल हुईं। प्रदेशभर में विकास पुरूष कहे जाने वाले पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय एन डी तिवारी की तरह विकास कार्यों को नए आयाम देने में जुटे सीएम धामी को लोग विकास के नए अध्य्याय का सूत्रपात मान रहे है।

उत्तराखंड में विभागों के राजस्व ने जहां राज्य के खजाने को भरा तो सीएम धामी के शालीन, सभ्य और सौम्य व्यवहार ने उनके राजनीतिक कद को लगातार आगे बढ़ाया, सीएम पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल की उपलब्धियां बढ़ती गयी और सीएम धामी की कार्यशैली चुनौतियों को सफलता में गढ़ती रही, बीते चार सालों से विरोधी उनके विकास कार्यों के विपरीत कोई नरेटिव खड़ा करने में कामयाब नहीं हो पाया, जिसके पीछे उनका दूरदर्शी नेतृत्व क्षमता कठोर परिश्रम, स्व-अनुशासन और राग-द्वेष के बिना कार्य करने की विशिष्ट शैली अहम भूमिका निभाती रही। राजनीतिक जीवन में चमक धमक से दूर रहकर सादगी को अपनाना, राजनीति में संयम बरतना और हर परिस्थिति में क्रियाशील बने रहना यही वो गुण हैं जिन्होंने धामी को प्रदेश की सियासत में सर्वोच्च शिखर तक पहुंचाया।

लखनऊ विश्वविद्यालय में उच्च शिक्षा ग्रहण करने के दौरान धामी अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़ गए थे। संगठन के साथ वह कार्यक्रम समन्वयक की भूमिका में रहे। वर्ष 2000 में पृथक उत्तराखण्ड राज्य बनने पर उन्होंने देहरादून का रूख किया। 2001 में उनके राजनैतिक गुरू भगत सिंह कोश्यारी को मुख्यमंत्री की कुर्सी मिली तो उन्होंने धामी को अपना सलाहकार नियुक्त किया। इस जिम्मेदारी से मुक्त होने के बाद धामी ने भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में कार्य किया। यही राजनैतिक संगठन उनके लिए उपयोगी मंच बना और उन्होंने राज्य के उद्योगों में स्थानीय युवाओं के लिए 70% रोजगार के अवसर आरक्षित करने के लिए जोरदार लड़ाई लड़ी। हर दायित्व को निष्ठा से निभाते हुए वे संगठन और समाज में अलग पहचान बनाने में सफल हुए। इसके फलस्वरूप उन्हें उत्तराखण्ड की विधानसभा के लिए वर्ष 2012 में खटीमा से निर्वाचित होने का अवसर मिला। इसी सीट से उन्हें 2017 में लगातार दूसरी जीत मिली। उनकी किस्मत का सितारा अचानक उस वक्त चमका जब उन्हें 4 जुलाई 2021 को उत्तराखंड के 10वें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उस वक्त धामी मुख्यमंत्री पद के लिए एकदम नया चेहरा थे। 23 मार्च 2022 तक के महज 8 माह के कार्यकाल में उन्होंने संयमित पारी खेली और भाजपा सरकार की एंटी-इनकम्बेंसी (सत्ता विरोधी लहर) को प्रो-इनकम्बेंसी (सत्ता समर्थक लहर) में बदल दिया। नतीजा भाजपा की प्रचंड जीत के रूप में सामने आया। रवायत टूटी और इतिहास में पहली बार किसी राजनैतिक पार्टी ने उत्तराखण्ड में लगातार दोबारा सरकार बनाई। हालांकि, धामी को अपनी सीट खटीमा से हार का सामना करना पड़ा। फिर भी पार्टी आलाकमान ने उन पर भरोसा जताया और सबको चौंकाते हुए उन्हें दूसरी बार मुख्यमंत्री बना दिया।

हुआ यह था कि महज आठ माह के पहले कार्यकाल में मुख्यमंत्री के तौर पर धामी की कुछ खूबियां (सरल स्वभाव और त्वरित निर्णय लेने की क्षमता) सामने आई थीं। इन्हीं खूबियों ने धामी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नजरों में सबसे उपयुक्त बनाया था। अब अपने दूसरे कार्यकाल में भी धामी धुआंधार बैटिंग कर रहे हैं। लगातार कर रहे हैं, चार साल से नॉट आउट हैं। इस अवधि में कई चुनौतियां उनके सामने आईं फिर भी वे बड़े और कड़े फैसले लेने से नहीं चूके। उनकी सरकार के कुछ निर्णय दूसरे राज्यों के लिए नजीर बन गए। भर्ती परीक्षाओं के लिए सख्त नकल विरोधी कानून, समान नागरिक संहिता, स्थानीय महिलाओं को सरकारी नौकरी में 30 फीसदी आरक्षण, राज्य आन्दोलनकारियों को 10 फीसदी क्षैतिज आरक्षण, सख्त धर्मांतरण कानून, जमीन जेहाद के खिलाफ कड़ी कार्रवाई, अंत्योदय परिवारों को साल में तीन मुफ्त गैस सिलेण्डर और सख्त भू कानून जैसे फैसलों ने धामी को राज्य के बाहर भी लोकप्रिय बना दिया। ‘जी20’ के तीन महत्वपूर्ण कार्यक्रम, ‘उत्तराखण्ड ग्लोबल इन्वेस्टर समिट’ और राष्ट्रीय खेलों के सफल आयोजन से भी धामी ने पूरे राष्ट्र का ध्यान उत्तराखण्ड की ओर आकर्षित किया। देखते ही देखते उत्तराखण्ड की सियासत में पुष्कर का कद बड़ा हो गया। उनकी हार्डकोर हिन्दुत्व वाली छवि को भाजपा ने अपने लिए मुफीद माना। यही वजह रही कि पार्टी हाईकमान ने मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और दिल्ली के विधानसभा चुनाव के प्रचार में धामी का उपयोग बड़े पैमाने पर किया। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में सीएम धामी की राजनीतिक उपयोगिता से शीर्ष नेतृत्व को जितना लाभ मिला उससे अधिक सीएम धामी की राजनीतिक पृष्ठ भूमि मजबूत होती दिखाई दी।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कार्यकाल के वर्ष विरोधियों को चित्त करते रहे तो राज्य में विकास कार्यों के आयाम गढ़ते रहे, सीएम धामी को राज्य की कमान सौपने के शीर्ष नेतृत्व के इस निर्णय को सफ़लता में गढ़ने का श्रेय आज लोकप्रिय सीएम धामी की कार्यशैली को जाता है।

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