उत्तराखंड के आईएएस की पत्नी बैंकिंग का हिसाब, मोह माया के जाल में नीलामी की तलवार, पढ़िए पूरा मामला…

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देहरादून: हरिद्वार से सामने आया एक मामला इन दिनों सत्ता,सिस्टम और नौकरशाही के गलियारों में कई बड़े सवाल खड़े कर रहा है.. दरअसल हरिद्वार में तैनाती के दौरान एक PCS अब आईएएस ने बाबू पर अंधा विश्वास किया.. लेकिन बदले में बाबू ने इस आईएएस को ऐसा दर्द दिया की आज साहब के साथ साथ उनकी श्रीमति जी का नाम एक दैनिक पेपर की सुर्खी बना हुआ है..चर्चा इस बात की है कि एक बेहद प्रभावशाली IAS अधिकारी, जो कभी जिले की सबसे महत्वपूर्ण कुर्सी पर बैठ चुका है और आज भी सिस्टम में सचिव पद पर होकर मजबूत पकड़ रखता है.. उससे जुड़े कारोबारी नेटवर्क की परतें अब धीरे-धीरे खुलती नजर आ रही हैं.. बताया जा रहा है कि वर्षों तक जमीनों में बड़े स्तर पर निवेश. पार्टनरों के साथ मिलकर संपत्तियों का खेल और परिवार के नाम पर वित्तीय लेन-देन का पूरा नेटवर्क तैयार किया गया।

हैरानी की बात यह है कि जिन लोगों पर प्रशासनिक पारदर्शिता बनाए रखने. कानून का पालन करवाने और व्यवस्था को ईमानदारी से संचालित करने की जिम्मेदारी होती है.. अगर उन्हीं से जुड़े नाम जमीनों के कारोबार.. बैंकिंग कर्ज और संपत्तियों के विवादों में सामने आने लगें.तो यह सिर्फ एक व्यक्तिगत मामला नहीं रह जाता..बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है..अब स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि एक राष्ट्रीयकृत बैंक को अखबारों में ई-नीलामी का नोटिस जारी करना पड़ रहा है…

सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतना बड़ा कारोबारी साम्राज्य खड़ा करने की जरूरत क्यों पड़ी? सरकारी सेवा में रहते हुए आखिर ऐसे कौन से निवेश मॉडल तैयार किए गए, जिनमें जमीनों का खेल.. बैंक से बड़े कर्ज और अब नीलामी जैसी नौबत सामने आ गई.. बताया जा रहा है कि संबंधित नेटवर्क से जुड़ी संपत्तियों का दायरा इतना बड़ा है कि उसका सही अनुमान लगाना भी आसान नहीं है..

आम आदमी छोटी सी आर्थिक जरूरत के लिए बैंक और दफ्तरों के चक्कर लगाता है..लेकिन जब रसूखदार लोगों से जुड़े मामलों में करोड़ों की संपत्तियां.बड़े निवेश और फिर बैंकिंग सिस्टम की कार्रवाई सामने आती है. तो जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है.. आखिर पर्दे के पीछे ऐसा कौन सा कारोबार चल रहा था.. जिसकी चमक बाहर दिखती रही और अंदर का सच अब नीलामी के नोटिसों में दिखाई देने लगा है।

यह मामला सिर्फ एक वित्तीय संकट नहीं..बल्कि यह उन सवालों का आईना है जिनका जवाब व्यवस्था को देना चाहिए.. अगर शासन में सचिव जैसी जिम्मेदारी वाली कुर्सी पर बैठे लोग ही समानांतर कारोबारी खेल में उलझे दिखाई दें..तो फिर सिस्टम में पारदर्शिता और जवाबदेही की उम्मीद आखिर किससे की जाये..लेकिन कुछ भी हो पंडित जी IAS को उनके चेले बाबू भाई ने बड़ी टेंशन दे दी है…

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