सार्वजनिक जीवन में उत्कृष्टता की अतुलनीय मिसाल मंत्री सुबोध उनियाल, पढ़िए वरिष्ठ पत्रकार अवनीश प्रेमी का लेख…

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राजनीति में अक्सर किसी व्यक्ति का मूल्यांकन उसके पूरे जीवन और कार्यों से नहीं. बल्कि कुछ सेकंड के वीडियो या किसी एक घटना से कर दिया जाता है। सोशल मीडिया के इस दौर में एक क्लिप वायरल होती है और फिर उसी के आधार पर चरित्र, व्यक्तित्व और योगदान का फैसला सुनाने की होड़ लग जाती है। आज कुछ ऐसा ही उत्तराखंड के वरिष्ठ नेता और कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल के साथ देखने को मिल रहा है।

सुबोध उनियाल कोई अचानक राजनीति में आए हुए नेता नहीं हैं। उनका सार्वजनिक जीवन दशकों पुराना है। उन्होंने सत्ता भी देखी है, संघर्ष भी देखा है और विपक्ष की राजनीति भी की है। यही वजह है कि उन्हें जानने वाले लोग एक बात जरूर कहते हैं कि वे हर परिस्थिति में अपने लोगों के साथ खड़े रहने वाले इंसान हैं।

साल 2004 से उन्हें नजदीक से देखने का अवसर मिला है। इतने वर्षों में एक बात साफ समझ आई कि वे शब्दों से भले कभी-कभी सख्त लग सकते हैं, लेकिन दिल के बेहद मुलायम और इंसानियत से भरपूर व्यक्ति हैं। पुराने लोग कहते हैं कि कुछ लोग जुबान के कड़वे होते हैं लेकिन दिल के बहुत साफ होते हैं। सुबोध उनियाल उन्हीं लोगों में गिने जाते हैं।

उनकी सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि उन्होंने खुद को जनता से कभी दूर नहीं किया। मंत्री बनने के बाद भी उनके दरवाजे आम लोगों के लिए खुले रहे। उत्तराखंड के अलग-अलग हिस्सों में हजारों ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनके लिए उन्होंने बिना किसी राजनीतिक लाभ के मदद का हाथ बढ़ाया।

राजनीति में ऐसे लोग कम होते हैं जो रिश्तों को पद से ऊपर रखते हैं। सुबोध उनियाल उन नेताओं में हैं जो अगर किसी व्यक्ति की बात को सही मान लें तो फिर उसके लिए मजबूती से खड़े भी रहते हैं। दोस्ती निभाना. कार्यकर्ताओं का सम्मान करना और जरूरतमंदों की मदद करना उनके स्वभाव का हिस्सा रहा है।

आज जिस तरह उन्हें ट्रोल किया जा रहा है. उसमें एक पक्ष दिखाई दे रहा है. लेकिन उनकी पूरी यात्रा शायद ही कोई देख रहा हो। किसी भी व्यक्ति के जीवन का आकलन एक क्षणिक प्रतिक्रिया से नहीं. बल्कि उसके वर्षों के आचरण. व्यवहार और योगदान से किया जाना चाहिए।

लोकतंत्र में सवाल पूछना जरूरी है जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही भी जरूरी है। लेकिन निष्पक्षता उससे भी ज्यादा जरूरी है। यदि किसी घटना पर चर्चा हो रही है तो उसके सभी पहलुओं को सामने आना चाहिए। केवल एक वीडियो या एक क्षण को पूरी सच्चाई मान लेना उचित नहीं कहा जा सकता।

सुबोध उनियाल की राजनीतिक यात्रा का एक बड़ा पहलू उनकी स्वीकार्यता भी है..शायद यही कारण है कि वे सत्ता में हों या विपक्ष में. हर दौर में अपनी अलग पहचान बनाए रखने में सफल रहे हैं। विरोधियों के बीच भी उनके व्यक्तिगत संबंध और संवाद की शैली अक्सर चर्चा का विषय रही है।

राजनीति में पद हासिल करना कठिन जरूर है.. लेकिन उससे भी कठिन है वर्षों तक लोगों का भरोसा बनाए रखना। जनता के सुख-दुख में शामिल होना.. हजारों उम्मीदों का बोझ उठाना और लगातार लोगों के बीच बने रहना हर किसी के बस की बात नहीं होती।

इसीलिए कहा जा सकता है कि सुबोध उनियाल पर राय बनाने से पहले उनके पूरे सार्वजनिक जीवन को देखना चाहिए। क्योंकि राजनीति में चेहरे बहुत मिल जाते हैं. लेकिन जिंदादिल…रिश्तों को निभाने वाले और लोगों के लिए खड़े रहने वाले व्यक्तित्व कम ही देखने को मिलते हैं।

शायद यही वजह है कि उन्हें जानने वाले आज भी कहते हैं __ मंत्री तो बहुत बनते हैं..लेकिन हर शख्स सुबोध उनियाल नहीं हो सकता।

 लेखक उत्तराखंड के वरिष्ठ पत्रकार अवनीश प्रेमी है….

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