हरिद्वार में अर्धकुंभ का होगा भव्य स्वरूप, गढ़वाल कमिश्नर विनय शंकर पांडेय ने निर्माण कार्यों को लेकर किया महत्वपूर्ण निर्णय…
हरिद्वार में अगले साल होने वाले अर्द्धकुंभ जैसे विराट और संवेदनशील आयोजन की तैयारी सिर्फ निर्माण कार्यों का मामला नहीं होती. यह प्रशासनिक क्षमता निर्णय लेने की गति और जिम्मेदारी की असली परीक्षा भी होती है… ऐसे समय में सरकार का यह फैसला कि 5 करोड़ से ऊपर के कार्य ही शासन स्तर पर जाएंगे.बाकी का निस्तारण स्थानीय स्तर पर हो दरअसल व्यवस्था को तेज और प्रभावी बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है।
इस पूरी प्रक्रिया में गढ़वाल कमिश्नर विनय शंकर पांडेय की भूमिका खास तौर पर उभरकर सामने आती है.. जिस तरह से एक से पांच करोड़ तक के कार्यों की स्वीकृति अब मंडल स्तर पर होगी .वह सीधे तौर पर कमिश्नर पर सरकार के विश्वास को दर्शाता है.यह सिर्फ अधिकारों का हस्तांतरण नहीं है बल्कि जिम्मेदारी का विस्तार भी है और यही वह बिंदु है जहां एक अधिकारी का कद असल मायनों में बढ़ता है.
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहले ही कुंभ को लेकर बेहद गंभीर नजर आ रहे हैं.. उनकी मंशा साफ है कि यह आयोजन सिर्फ औपचारिक न रहे. बल्कि दिव्य ..भव्य और अलौकिक स्वरूप में दुनिया के सामने आए. इसके लिए वे हर स्तर पर अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दे रहे हैं और लगातार मॉनिटरिंग भी कर रहे हैं.ऐसे माहौल में जब शीर्ष नेतृत्व स्पष्ट और सक्रिय हो.तो नीचे तक ऊर्जा अपने आप पहुंचती है…
गढ़वाल कमिश्नर विनय शंकर पांडेय इस ऊर्जा को जमीन पर उतारते हुए दिख रहे हैं.. निर्णय लेने की तेजी, कार्यों की प्राथमिकता तय करने की समझ और समयबद्धता पर जोर ये सभी संकेत देते हैं कि वे सिर्फ आदेशों का पालन नहीं कर रहे. बल्कि पूरी प्रक्रिया में जान फूंकने का काम कर रहे हैं.. कुंभ जैसे आयोजन में देरी या फाइलों का अटकना सबसे बड़ी बाधा होता है.. और सरकार का यह नया सिस्टम उसी बाधा को खत्म करने की कोशिश है. जिसे पांडेय जैसे अधिकारी मजबूती से आगे बढ़ा रहे हैं।
एक तरह से देखा जाए तो मुख्यमंत्री धामी ने न सिर्फ व्यवस्था को सरल बनाया है. बल्कि ऐसे अधिकारियों के कद को भी बढ़ाया है जो जिम्मेदारी उठाने की क्षमता रखते हैं.. विनय शंकर पांडेय इस विश्वास पर खरे उतरते नजर आ रहे हैं… अब यह सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह गई. बल्कि एक साझा लक्ष्य बन चुका है कुंभ को ऐसा बनाना.जो व्यवस्था, आस्था और प्रबंधन का बेहतरीन उदाहरण बने..
जब शीर्ष नेतृत्व की स्पष्ट दृष्टि और मैदान में काम कर रहे अधिकारी की प्रतिबद्धता एक दिशा में चलती है. तब परिणाम साधारण नहीं होते.. गढ़वाल में फिलहाल यही तस्वीर बनती दिख रही है..जहां जिम्मेदारी को बोझ नहीं.. बल्कि अवसर की तरह लिया जा रहा है और यही किसी भी बड़े आयोजन की असली ताकत होती है।

